अब हो सकेगा हाइपर एक्टिव बच्चों का इलाज

आपका बच्चा बात-बात पर आपा खो देता है, या फिर बातें तो बड़ी-बड़ी करता है लेकिन बोलने में वक्त लगाता है और सपने देखने में इतना माहिर है कि जब चाहे सो जाता है तो सावधान हो जाइए। वो अटेंशन डिफेंसिट हाइपर एक्टिव डिसआॅर्डर (एडीएचडी) का शिकार है, लेकिन परेशान होने की बात नहीं है। अभी तक बाॅयलाॅजिकल डिसआॅर्डर समझकर नजरअंदाज कर देने वाली बीमारी का इलाज खोजने में कॅरिअर पाॅइंट यूनिवर्सिटी (सीपीयू) की शोध छात्रा रजनी इनबावनन ने सफलता हासिल की है।

जांच के लिए तकनीकी टेस्ट भी नहीं
मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया और यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 3 में से 1 लड़का और 4 में से एक लड़की बचपन से हाइपर एक्टिव होते हैं। इसकी वजह बायोलाॅजिकल होती है। इसकी जांच के लिए कोई तकनीकी टेस्ट भी नहीं है। सिर्फ लक्षणों से ही इस न्यूरो डवलपमेंट डिसआॅर्डर की पहचान होती है। जिन बच्चों में 5 में से 6 लक्षण मिलते हैं, उन्हें इसका शिकार माना जाता है। पहचान के बाद बच्चों को स्टिमुलेट्स टेबलेट्स दी जाती है। हालांकि, ज्यादातर डाक्टर इससे बचते हैं, क्योंकि इससे साइड इफेक्ट की आशंका ज्यादा रहती है।

सेंसर इंटीग्रेशन थैरेपी विकसित
पेशे से साइकोथैरेपिस्ट और शोध छात्रा रजनी ने बताया कि सबसे पहले लक्षणों की पहचान होते ही अभिभावकों को इस बीमारी के प्रति जागरुक होना पड़ेगा। बच्चे से ज्यादा अभिभावकों को काउंसलिंग की जरुरत होती है। बीमारी के शिकार बच्चों को दवा की जगह थैरेपी दी जानी चाहिए। इवबावनन ने इसके प्रभावी इलाज के लिए न्यूरो लिंग्यूस्टिक प्रोग्राम और सेंसर इंटीग्रेशन थैरेपी विकसित की है। जिसे मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया ने भी मान्यता दे दी है। इस थैरेपी से बच्चों में रोज की चुनौतियों से निबटने की क्षमता बढाई जाती है।
ये होती है समस्या
स्कूल जाने वाले कई किशोर उम्र के स्टूडेंट्स में डायग्नोसिस से पता चला है कि वे मेंटल डिस्आॅर्डर से ग्रसित होते हैं। उनके एकेडमिक स्किल में बड़े स्तर पर परिवर्तन देखने को मिलता है। पढने-लिखने व मैथ्स के कंसेप्ट समझने में इन्हें काफी परेशानी होती है। हाइपर एक्टिविटी लेवल, सुनने की क्षमता कम रखने और एकाग्रता में कमी होने से ऐसे बच्चे पढाई में पिछड़ जाते है।

लक्षण पहचानने में मिली सफलता
सीपीयू की शोध छात्रा रजनी ने इस डिस्आॅर्डर की पहचान एवं इसके उपचार का नया तरीका खोज निकाला है। अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिव डिसआॅर्डर (एडीएचडी) 7 वर्ष से कम उम्र में बच्चों को घेरना शुरु करता और किशोर अवस्था तक रहता है। बातों की अनदेखी करना, हाइपर एक्टिविटी और इम्पल्सिविटी इसके लक्षण हैं। इन लक्षणों से ब्रेन के सेंसेटिव सिस्टम में मुश्किलें आने लगती है। बीमारी का असर दो तरीके से होता है। काॅमन मेंटल डिस्आॅर्डर, जिसमें बच्चों का भावनात्मक विकास बाधित होने लगता है और वे असंवेदनशील हो जाते है। वहीं जटिल डिस्आॅर्डर की चपेट में आकर बच्चे जल्दी धैर्य खोकर गुस्सा करने लगते हैं, लापरवाही और बड़बोलेपन का शिकार हो जाते है। ज्यादा नींद लेना और बोलने में देरी करना जैसी आदतें भी दिखने लगती है। इन लक्षणों पर अभिभावकों के लिए नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।

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